Electronic cigarettes: Healthier alternative to regular tobacco cigarettes?



Electronic cigarettes, popularly touted as healthier alternatives to regular cigarettes, has now been associated with a higher risk of coronary artery disease, anxiety, circulatory problems, depression and stroke. Electronic cigarettes heat liquids typically containing nicotine and some flavours to release steam or vapours which are then inhaled by the smoker. Many think that e-cigarettes can cut down the risk of health problems posed by regular cigarettes. However, a study by the University of Kansas in the US has debunked this belief. The study has found that smoking e-cigarettes, also called as vaping can increase your chances of suffering from heart attacks by 56 per cent, from strokes by 30 per cent, from coronary artery disease by 10 per cent and from circulatory problems by 44 per cent. Many e-cigarettes contain nicotine. E-cigarettes are known to release toxic compounds very similar to tobacco smoking. The study also noted that the health risks of diseases for those who smoke regular tobacco cigarettes are much higher as compared to those who use e-cigarettes. But, by no means does that mean that e-cigarettes are a safer option, according to some studies.

Recently, the US Food and Drug Administration (FDA) proposed to curb sales of all flavoured electronic nicotine delivery system (ENDS) products such as electronic cigarettes, except tobacco, mint and menthol-flavoured products to teenagers. This reason was to ‘prevent youth access to, and appeal of, flavoured e-cigarettes and cigars,’ according to FDA Commissioner Scott Gottlieb, said in a statement. One of the main problems with e-cigarettes is that they can be highly addictive because of the flavours. A research found that flavours, especially fruit-based ones don’t just attract but also retain smokers into the vaping category.

Here are some health risks associated with e-cigarettes:

  • A previous study by the University of Nevada, Reno claimed that e-cigarettes release a large quantity of cancer-causing aldehydes which are absorbed into the lungs. in fact, non-cigarette tobacco users including those using electronic cigarettes are exposed to high levels of carcinogen, almost as much as a regular cigarette smoker exposed to. In fact, e-cigarette smokers were found to have greater exposure to Tobacco-Specific Nitrosamines (TSNA), another factor responsible for cancer.
  • E-cigarettes can also prevent faster skin wound healing. Regular tobacco cigarettes, too,  are known to delay healing of skin wounds and infections.
  • A Greek study in 2018 claimed that e-cigarette flavours damage the lungs by causing inflammation which is similar to or worse than regular cigarettes.

 



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Study Finds Eating Junk Food Can Raise Risk of Bipolar Disorder And Depression



Feeling depressed? It’s time to cut out the unhealthy junk food from your diet as it increases the risk of psychological disorders including bipolar disorder and depression, say researchers.

Junk food is not only harmful for metabolism but also increases the risk of psychological problems such as bipolar disorder and depression, irrespective of personal characteristics such as age, gender, education and marital status, according to the study, published in the International Journal of Food Sciences and Nutrition.

High-sugar consumption was found to be linked with bipolar disorder, while fried foods or processed grains were associated with depression.

“Perhaps the time has come for us to take a closer look at the role of diet in mental health because it could be that healthy diet choices contribute to mental health,” said lead author Jim E Banta, Associate Professor at Loma Linda University, California.

“More research is needed before we can answer definitively, but the evidence seems to be pointing in that direction,” Banta added.

The findings provide “additional evidence that public policy and clinical practice should more explicitly aim to improve diet quality among those struggling with mental health”.

It also pointed out that “dietary interventions for people with mental illness should especially target young adults, those with less than 12 years of education, and obese individuals.”

For the study, the team of researchers reviewed data from over 2,40,000 telephone surveys conducted between 2005 and 2015.



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Health Tips: अखरोट खाने से कम हो सकता है D‍epression का खतरा



लॉस एंजिलिस: अमेरिका में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक अखरोट खाने से अवसाद का खतरा कम हो जाता है और एकाग्रता का स्तर बेहतर होता है. कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने अखरोट खाने वाले लोगों में अवसाद का स्तर 26 प्रतिशत कम, जबकि इस तरह की अन्य चीजें खाने वालों में अवसाद का स्तर आठ प्रतिशत कम पाया है.

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यह अध्ययन न्यूट्रेंट जर्नल में प्रकाशित किया गया है. अध्ययन में पाया गया है कि अखरोट खाना शरीर में ऊर्जा में वृद्धि और बेहतर एकाग्रता से संबद्ध है. विश्वविद्यालय के प्रमुख शोधार्थी लेनोर अरब ने एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि अध्ययन में शामिल किए गए छह में से हर एक वयस्क जीवन में एक समय पर अवसाद ग्रस्त होगा . इससे बचने के लिए किफायती उपायों की जरूरत है जैसे कि खान – पान में बदलाव करना.

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अध्ययन में इतने लोग हुए शामिल
अरब ने बताया कि अखरोट पर शोध पहले हृदय रोगों के संबंध में किया गया है और अब इसे अवसाद के लक्षण से संबद्ध कर देखा जा रहा है. इस अध्ययन में 26,000 से अधिक अमेरिकी वयस्कों को शामिल किया गया.

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सुबह जल्दी उठने का ये है सबसे बड़ा फायदा, क्‍या इसे जानते हैं आप?


अक्‍सर बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि सुबह जल्‍दी उठने की आदत डालो. इसके कई फायदे होते हैं. अब एक अध्‍ययन में भी इस बात पर मुहर लग गई है.

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अध्ययन में कहा गया है कि जिन लोगों में आनुवांशिक रूप से सुबह जल्दी उठने की आदत होती है, उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है. यही नहीं, ऐसे लोगों को सिजोफ्रेनिया और डिप्रेशन होने का खतरा कम होता है.

इस अध्‍ययन की रिपोर्ट को नेचर कम्युनिकेशंस नाम के जर्नल में प्रकाशित किया गया है. अध्ययन में ‘बॉडी क्लॉक’ को लेकर कुछ खुलासे किए गए हैं. इसमें बताया गया है कि सुबह उठना मानसिक स्वास्थ्य और बीमारियों से कैसे जुड़ा होता है.

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हालांकि इस अध्ययन के नतीजे का मधुमेह या मोटापे जैसी बीमारियों से किसी मजबूत संबंध होने का खुलासा नहीं हुआ है, जैसे की पूर्व में कयास लगाए जाते रहे हैं.

अध्‍ययन किया ब्रिटेन में एक्सटर विश्वविद्यालय और अमेरिका के मैसाच्युसेट्स जनरल हॉस्पीटल (एमजीएच) ने. अध्ययन में ‘बॉडी क्लॉक’ के लिये शरीर की मदद में आखों के रेटीना की अहम भूमिका को रेखांकित किया गया है.
(एजेंसी से इनपुट)

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Alert: चेहरे पर Pimple और Hair से महिलाओं में बढ़ा Depression का खतरा, करें ये उपाय



नई दिल्ली: महिलाओं के चेहरे पर मुंहासे और बाल वर्तमान में एक आम समस्या बन गए हैं इससे उनमें समाज में शर्म की स्थिति झेलने के साथ-साथ भावनात्मक तनाव और अवसाद की चपेट में आने का खतरा रहता है. इस समस्या को पॉलीसिस्टिक ओवरियन सिन्ड्रोम (पीसीओएस) कहा जाता है, जिसका जल्दी ही उचित उपचार मिलने से भावनात्मक तनाव कम हो सकता है. पॉलीसिस्टिक ओवरी सिन्ड्रोम वास्तव में एक मेटाबोलिक, हार्मोनल और साइकोसोशल बीमारी है, जिसका प्रबंधन किया जा सकता है, लेकिन ध्यान नहीं दिये जाने से रोगी के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है.

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एक अध्यनन के मुताबिक, भारत में पांच में से एक वयस्क महिला और पांच में से दो किशोरी पीसीओएस से पीड़ित है. मुंहासे और हिरसुटिज्म पीसीओएस के सबसे बुरे लक्षण हैं. पीसीओएस का प्रमुख लक्षण है हाइपरएंड्रोजेनिज्म, जिसका मतलब है महिला शरीर में एंड्रोजन्स (पुरुष सेक्स हॉर्मोन, जैसे टेस्टोस्टेरोन) की उच्च मात्रा. इस स्थिति में महिला के चेहरे पर बाल आ जाते हैं. दिल्ली में ऑब्स्टेट्रिक्स एवं गायनेकोलॉजी की निदेशक व दिल्ली गायनेकोलॉजिस्ट फोरम (दक्षिण) की अध्यक्ष डॉ. मीनाक्षी आहूजा ने कहा कि त्वचा की स्थितियों, जैसे मुंहासे और चेहरे पर बाल को आम तौर पर कॉस्मेटिक समस्या समझा जाता है. महिलाओं को पता होना चाहिए कि यह पीसीओएस के लक्षण है और हॉर्मोनल असंतुलन तथा इंसुलिन प्रतिरोधकता जैसे कारणों के उपचार हेतु चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए.

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पीसीओएस एक चुनौतीपूर्ण सिन्ड्रोम
मुंहासे और हिरसुटिज्म के उपचार के बारे में डॉ. मीनाक्षी आहूजा ने कहा कि पीसीओएस एक चुनौतीपूर्ण सिन्ड्रोम है, लेकिन जोखिमों का प्रबंधन करने के पर्याप्त अवसर हैं. पीसीओएस के बारे में बेहतर जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि महिलाएं लक्षणों को पहचानें और सही समय पर सही मेडिकल सहायता लें. उन्होंने कहा कि स्वस्थ जीवनशैली, पोषक आहार, पर्याप्त व्यायाम और उपयुक्त उपचार अपनाने से पीसीओएस के लक्षण नियंत्रित हो सकते हैं. पीसीओएस के कारण होने वाला हॉर्मोनल असंतुलन उपचार योग्य होता है, ताकि मुंहासे और हिरसुटिज्म को रोका जा सके. गायनेकोलॉजिस्ट से उपयुक्त मेडिकल मार्गदर्शन प्रभावी उपचार के लिए महत्वपूर्ण है.

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पांच से आठ प्रतिशत महिलाएं हिरसुटिज्म से पीड़ित
देश में पांच से आठ प्रतिशत महिलाएं हिरसुटिज्म से पीड़ित हैं. हार्मोन के असंतुलन के कारण मुंहासे भी होते हैं और यह पीसीओएस का लक्षण है. यह दोनों लक्षण महिला की शारीरिक दिखावट को प्रभावित करते हैं और इनका उपचार न होने से महिला का आत्मविश्वास टूट जाता है और उनका अपने प्रति आदर कम होता है. मुंहासे से पीड़ित 18 प्रतिशत रोगियों में गंभीर डिप्रेशन और 44 प्रतिशत में एन्ग्जाइटी देखी गई है.

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समय पर नहीं कराया उपचार तो खराब हो सकती स्किन
डॉ. आहूजा ने कहा कि पीसीओएस से पीड़ित महिलाओं की भलाई सुनिश्चित करने के लिए समाज और परिवारों को साइकोलॉजिकल तनाव को समझने और साथ ही पूरे आत्मविश्वास के साथ दुनिया का सामना करने के लिए उन्हें सहयोग देने के लिए प्रयास करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि अधिकांश महिलाओं को इन स्थितियों का बोध नहीं है और वे चिकित्सकीय मार्गदर्शन के बिना सामयिक उपचार लेती हैं, जिससे त्वचा खराब हो सकती है. यह जानना महत्वपूर्ण है कि अगर आप लक्षणों का उपचार नहीं करेंगे, तो मुंहासे और चेहरे पर बाल दोबारा आ जाएंगे.

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Health Alert: जानें क्या है 'विंटर ब्लू', सर्दियों में क्यों बढ़ते हैं लोगों में Depression के लक्षण



नई दिल्ली: सर्दियों में अक्सर दिन की लंबाई कम होती है और इस दौरान व्यक्ति को दिन भर में धूप की रोशनी भी कम ही मिलती है, जिसके कारण उनमें सीजनल डिप्रेशन (सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर ) या ‘विंटर ब्लू’ की स्थिति पैदा हो जाती है. यह डिप्रेशन साल के एक ही समय में होता है और जैसे-जैसे दिन की लंबाई कम होती है डिप्रेशन यानी अवसाद के लक्षण बढ़ते चले जाते हैं. नोएडा स्थित जेपी हॉस्पिटल के बिहेवियरल साइन्सेज के सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. मृणमय दास ने इस रोग के कुछ कारण बताए हैं.

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सिरकाडियन रिदम (जैविक घड़ी)
सर्दियों में धूप की रोशनी कम होना सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (एसएडी) का कारण बन सकता है. धूप कम मिलने से शरीर की जैविक घड़ी प्रभावित होती है और व्यक्ति डिप्रेशन के लक्षण महसूस करने लगता है.

शरीर में सिरेटोनिन का स्तर
सिरेटोनिन एक न्यूरोट्रांसमीटर है, शरीर में इसका स्तर कम होने का असर व्यक्ति के मूड पर पड़ता है और व्यक्ति एसएडी का शिकार हो सकता है. विटामिन डी शरीर में सिरेटोनिन के उत्पादन में मुख्य भूमिका निभाता है, विटामिन डी की कमी से शरीर में सिरेटोनिन का स्तर गिरता है. इससे व्यक्ति दिन में कम एनर्जी और सुस्ती महसूस करता है.

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मेलेटोनिन का स्तर
मेलेटोनिन ऐसा हॉर्मोन है जिसका असर हमारी नींद और मूड पर पड़ता है. एएसडी से पीड़ित व्यक्ति में सर्दियों में मेलेटोनिन ज्यादा बनता है. सर्दियों में अंधेरा जल्दी होता है, इसलिए दिमाग को लगता है कि सोने का समय हो गया है, इसलिए शरीर मेलेटोनिन का उत्पादन जल्दी शुरू हो जाता है. सर्दियों में सुबह के समय भी धूप कम रहती है इसलिए शरीर में मेलेटोनिन का स्तर ज्यादा हो जाता है और व्यक्ति दिन में भी सुस्ती महसूस करता है.

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हाइपोथेलेमस
धूप हाइपोथेलेमस को उत्तेजित करती है, हाइपोथेलेमस दिमाग का वह हिस्सा है जो नींद, मूड और भूख पर नियन्त्रण रखता है.

डॉ. मृणमय दास ने इसके जोखिम के कारक के बारे में बताते हुए कहा कि जिन लोगों के परिवार में एसएडी या डिप्रेशन से पीड़ित कोई व्यक्ति हो, उनमें इसकी संभावना अधिक होती है. पुरुषों की तुलना में महिलाओं में एसएडी के मामले ज्यादा पाए जाते हैं. इसके अलावा बुजुर्गो के बजाए युवाओं में इसकी संभावना अधिक होती है. मेजर डिप्रेशन या बाइपोलर डिसऑर्डर. अगर व्यक्ति को इनमें से कोई भी समस्या है तो डिप्रेशन/ अवसाद के लक्षण ज्यादा गंभीर हो सकते हैं. एसएडी के लक्षणों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि कम एनर्जी महसूस करना, सुस्ती या आलस महसूस करना, एकाग्रता में कमी, सोने में परेशानी, निराशा या अपराधबोध महसूस करना, आपको जो काम कभी अच्छे लगते थे, उनमें रुचि खो देना, भूख या वजन में बदलाव, लगभग रोजाना, दिन के ज्यादातर समय डिप्रेशन महसूस करना.

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एसएडी का इलाज न किया जाने पर कई समस्याएं हो सकती हैं, जिनके बारे में बताते हुए डॉ. मृणमय दास ने कहा कि स्कूल और काम में समस्याएं, आत्महत्या की सोच या व्यवहार, अपने आप को समाज से अलग या अकेला महसूस करना या नशे की आदत या बुरी लत, अन्य मानसिक समस्याएं जैसे चिंता या खाने-पीने की समस्याएं. वहीं इसके उपचार के बारे में डॉ. मृणमय दास ने कुछ उपाय सुझाएं, जो कि इस प्रकार हैं.

* एंटीडिप्रेसेन्ट: डिप्रेशन और कभी कभी एसएडी के गंभीर मामलों में इलाज के लिए एंटीडिप्रेसेन्ट दवाएं दी जाती हैं. सर्दियों में अगर लक्षण शुरू होने से पहले ये दवाएं शुरू कर दी जाएं तो परिणाम बेहतर हो सकते हैं. इन्हें बसंत का मौसम शुरू होने तक जारी रखना चाहिए.

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* लाईट थेरेपी : 1980 के दशक से ही लाईट थेरेपी को एसएडी के लिए अच्छा इलाज माना जाता है. धूप की कमी के कारण होने वाली इस समस्या को दूर करने के लिए मरीज को कृत्रिम रोशनी दी जाती है. सुबह के समय लाईट बॉक्स के सामने बैठने से मरीज को लक्षणों में आराम मिलता है.

* साइकोथेरेपी : सीबीटी या कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी साइकोथेरेपी का एक प्रकार है जो एसएडी के इलाज में बेहद फायदेमंद है. पारम्परिक सीबीटी का इस्तेमाल एसएडी के लिए किया जाता है. इसमें व्यक्ति के नकारात्मक सोच या विचारों को पहचाना जाता है और बिहेवियर एक्टिवेशन नामक तकनीक से उसमें सकारात्मक सोच को प्रोत्साहित किया जाता है.

* विटामिन डी : आमतौर पर सर्दियों के महीनों में प्राकृतिक रोशनी की कमी सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर का कारण बन सकती है. धूप शरीर में विटामिन डी बनाने के लिए भी जरूरी है. प्राकृतिक रोशनी से शरीर में सेरेटोनिन का स्तर बढ़ता है. यह मूड को नियमित करने वाला एक रसायन है.

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Getting Upset on Seeing Everyone Have a Better Life on Facebook, Instagram And Other Negative Such Social Media Behaviours Are Linked to Depression: Study



While scrolling through Facebook or Instagram, did you ever feel that everyone else is living their life better than you? Such social media behaviours are linked with major depressive disorder (MDD), said researchers.

In a study of over 500 millennials who actively use Facebook, Twitter, Instagram, and/or Snapchat, the team from the Texas State University identified five key social media factors associated with MDD.

Individuals who were more likely to compare themselves to others better off than they were, those who indicated that they would be more bothered by being tagged in unflattering pictures and those less likely to post pictures of themselves along with other people were more likely to meet the criteria for MDD.

The study, reported in the Journal of Applied Biobehavioural Research, also found that participants following over 300 Twitter accounts were less likely to have MDD. Participating in negative social media behaviours is also associated with a higher likelihood of having MDD.

“While the study highlights social media behaviours that are associated with major depression, it is important to recognise that social media use can offer many positive benefits, including fostering social support,” said Krista Howard, from the Texas State University.

“The key is for individuals to develop an awareness of how they currently use social media and to determine what changes could be made in their social media use to reduce the behaviours associated with psychological distress.

“Some changes could include reducing the time spent on social media, unfollowing individuals or groups that cause distress, or limiting online social comparisons,” Howard said.



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You Could be Committed to These Negative Social Media Behaviours That Are Linked to Depression



While scrolling through Facebook or Instagram, did you ever feel that everyone else is living their life better than you? Such social media behaviours are linked with major depressive disorder (MDD), said researchers.

In a study of over 500 millennials who actively use Facebook, Twitter, Instagram, and/or Snapchat, the team from the Texas State University identified five key social media factors associated with MDD.

Individuals who were more likely to compare themselves to others better off than they were, those who indicated that they would be more bothered by being tagged in unflattering pictures and those less likely to post pictures of themselves along with other people were more likely to meet the criteria for MDD.

The study, reported in the Journal of Applied Biobehavioural Research, also found that participants following over 300 Twitter accounts were less likely to have MDD. Participating in negative social media behaviours is also associated with a higher likelihood of having MDD.

“While the study highlights social media behaviours that are associated with major depression, it is important to recognise that social media use can offer many positive benefits, including fostering social support,” said Krista Howard, from the Texas State University.

“The key is for individuals to develop an awareness of how they currently use social media and to determine what changes could be made in their social media use to reduce the behaviours associated with psychological distress.

“Some changes could include reducing the time spent on social media, unfollowing individuals or groups that cause distress, or limiting online social comparisons,” Howard said.



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लड़कों से ज्‍यादा लड़कियों को लगा सोशल मीडिया का चस्‍का, हो रहीं इस बीमारी का शिकार



लंदन: सोशल मीडिया पर लड़कों की तुलना में ज्यादा समय बिताने वाली किशोरियों में अवसाद का खतरा ज्यादा होने की संभावना होती है. समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) की यवोन्ने केली की अगुवाई में शोधकर्ताओं ने पाया कि करीब 40 फीसदी लड़कियां जो सोशल मीडिया पर एक दिन में पांच घंटे से ज्यादा समय बिताती हैं, उनमें अवसाद के लक्षण दिखते हैं.

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यह दर लड़कों में बहुत कम है. इनमें यह 15 फीसदी से कम है. रॉयल कॉलेज ऑफ साइकियाट्रिस्ट्स के पूर्व अध्यक्ष साइमन वेस्ली के अनुसार, इस घटना की अंतर्निहत प्रक्रिया को सही से समझा नहीं गया है. ‘गार्जियन’ ने वेस्ली के बयान के हवाले से कहा कि शोधकर्ता अभी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते हैं कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल से मानसिक स्वास्थ्य पर खराब असर पड़ता है, लेकिन साक्ष्य इसी दिशा में संकेत देना शुरू कर चुके हैं. इस शोध को ‘ईक्लिनिकलमेडिसीन’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है. इसमें शोध दल ने 14 साल की उम्र के करीब 11,000 लोगों के साक्षात्कार शामिल किए है.

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क्‍या है अवसाद
अवसाद की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब हम जीवन के हर पहलू पर नकारात्मक रूप से सोचने लगते हैं. जब यह स्थिति चरम पर पहुंच जाती है तो व्यक्ति को अपना जीवन निरूद्देश्य लगने लगता है. जब मस्तिष्क को पूरा आराम नहीं मिल पाता और उस पर हमेशा एक दबाव बना रहता है तो समझिए कि तनाव ने आपको अपनी चपेट में ले लिया है. तनाव के कारण शरीर में कई हार्मोन का स्तर बढ़ता जाता है, जिनमें एड्रीनलीन और कार्टिसोल प्रमुख हैं. लगातार तनाव की स्थिति अवसाद में बदल जाती है. अवसाद एक गंभीर स्थिति है. हालांकि यह कोई रोग नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि आपका शरीर और जीवन असंतुलित हो गया है.

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बुजुर्गों को यहां घुमाने ले जाएं, कभी नहीं होंगे उदास, कोसों दूर रहेगी ये बीमारी…



सिनेमा, थिएटर या संग्रहालय जैसी सांस्कृतिक गतिविधियों के नियमित रूप से संपर्क में रहने से बुजुर्ग अवसाद से दूर रह सकते हैं. एक नए अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है. अवसाद एक बड़ा मुद्दा है, जिससे लाखों लोग प्रभावित होते हैं, विशेषकर बुजुर्ग.

अध्ययन में सामने आया कि वे लोग जो प्रत्येक दो-तीन महीने में फिल्में, नाटक या प्रदर्शनी देखते हैं, उनमें अवसाद विकसित होने का जोखिम 32 फीसदी कम होता है. वहीं, जो महीने में एक बार जरूर यह सब चीजें करते हैं उनमें 48 फीसदी से कम जोखिम रहता है.

ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की वरिष्ठ रिसर्च एसोसिएट डेजी फैनकोर्ट ने कहा, ‘लोग मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ते हैं लेकिन हमें इसके व्यापक फायदों के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत है’.

ब्रिटिश जर्नल ऑफ साइकियाट्री में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, ‘इन सांस्कृतिक गतिविधियों की शक्ति सामाजिक संपर्क, रचनात्मकता, मानसिक उत्तेजना और सौम्य शारीरिक गतिविधि के संयोजन में निहित है, जो उन्हें प्रोत्साहित करती है’.

फैनकोर्ट के मुताबिक, ‘अगर हम तनाव या कुछ अलग सा महसूस करना शुरू कर देते हैं तो सांस्कृतिक जुड़ाव वह सामान्य चीज है, जिससे हम हमारे मानसिक स्वास्थ्य की सक्रिय रूप से मदद कर सकते हैं ताकि वह उस बिंदु तक न पहुंचे, जहां हमें किसी पेशेवर चिकित्सा मदद लेने की जरूरत आ पड़े’.

अध्ययन के लिए, शोधकर्ताओं ने 50 से ज्यादा की उम्र के 248 से अधिक लोगों का अध्ययन किया.
(एजेंसी से इनपुट)

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