Aim, History, And Theme of International Day of Persons with Disabilities 2019



International Day of Persons with Disabilities is celebrated on December 3 every year. This global campaign aims at improving the lives of disabled persons globally keeping their dignity in mind. It is also observed to make people aware of different types of disabilities and make the disables individuals an active part of political, social, economic and cultural life.

History of International Day of Persons with Disabilities

The United Nations General Assembly announced the year 1981 as the International Year of Disabled Persons. This was done to initiate programs on regional, national, and international levels to provide the same opportunities to the disabled people which those without any health issues enjoy. Also, this aimed at providing proper rehabilitation to disabled persons and try to prevent the onset of disability in the future. The theme of the International Year of Disabled Persons in 1981 was “Full Participation and Equality”.

Later, the General Assembly announced the duration between 1983 to 1992 as the United Nations Decade of Disabled Persons. This was done to lend time to the different organizations and governments to implement the activities that were recommended during the World Programme of Action. It was in the year 1998, that the entire world started celebrating the day as the International Day of Persons with Disabilities.

Themes of International Day of Persons with Disabilities

1998: Arts, Culture and Independent Living
1999: Accessibility for all for the new Millennium
2000: Making information technologies work for all
2001: Full participation and equality: The call for new approaches to assess progress and evaluate the outcome
2002: Independent Living and Sustainable Livelihoods
2003: A Voice of our Own
2004: Nothing About Us Without Us
2005: Rights of Persons with Disabilities: Action in Development
2006: E-Accessibility
2007: Decent Work for Persons with Disabilities
2008: Convention on the Rights of Persons with Disabilities: Dignity and justice for all of us
2009: Making the MDGs Inclusive: Empowerment of persons with disabilities and their communities around the world
2010: Keeping the promise: Mainstreaming disability in the Millennium Development Goals towards 2015 and beyond
2011: Together for a better world for all: Including persons with disabilities in development
2012: Removing barriers to create an inclusive and accessible society for all
2013: Break Barriers, Open Doors: for an inclusive society and development for all
2014: Sustainable development: The promise of technology
2015: Inclusion matters: access and empowerment for people of all abilities
2016: Achieving 17 Goals for the future we want
2017: Transformation toward sustainable and resilient society for all
2018: Empowering persons with disabilities and ensuring inclusiveness and equality
2019: Promoting the participation of persons with disabilities and their leadership: taking action on the 2030 Development Agenda



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नई दिल्ली: यह सामान्य ज्ञान है कि शारीरिक निष्क्रियता बीमारी और विकलांगता का एक प्रमुख कारण है. कुछ न करने से बेहतर है कि कोई भी गतिविधि की जाए. लोगों को प्रति सप्ताह 150 मिनट तक मध्यम व्यायाम करना चाहिए, लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का तर्क है कि यह सिफारिश कुछ लोगों को भारी लग सकती है. द लांसेट में प्रकाशित एक लेख में पाया गया कि 10 में से 4 भारतीय पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं हैं. कुछ अध्ययनों ने यहां तक कहा है कि 52 प्रतिशत भारतीय शारीरिक रूप से निष्क्रिय हैं. एक अन्य अध्ययन से संकेत मिला है कि गतिहीन जीवन शैली धूम्रपान, मधुमेह और हृदय रोग से भी बदतर है.

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इस बारे में पद्मश्री चिकित्सक डॉ. के के अग्रवाल ने कहा कि व्यायाम की कमी सेलुलर स्तर तक मानव शरीर को प्रभावित करती है. आधुनिक और उन्नत तकनीक ने निश्चित रूप से हमारे लिए जीवन को आसान और सुविधाजनक बना दिया है. ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन भुगतान, जानकारी तक पहुंच, ये सारे काम हम घर बैठे आराम से कर सकते हैं. लेकिन, क्या तकनीक ने वास्तव में हमारे जीवन को बेहतर बनाया है? इसने एक गड़बड़ यह भी की है कि स्वास्थ्य की कीमत पर हमारी जीवन शैली का पैटर्न बदल गया है और हम अब शारीरिक रूप से कम सक्रिय हैं. उन्होंने कहा कि कंप्यूटर पर लंबे समय तक डेस्क पर बैठकर, स्मार्टफोन पर सोशल मीडिया का उपयोग करते हुए, टीवी देखते हुए या मीटिंग में बैठे हुए, ये सभी गतिविधियां गतिहीन व्यवहार को बढ़ावा देती हैं.

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योजना बनाकर करें व्यायाम
व्यायाम शारीरिक गतिविधि का पर्याय नहीं है. व्यायाम को योजना बनाकर किया जाता है, यह व्यवस्थित होता है और इसे दोहराया जाता है, जबकि अन्य गतिविधियां खाली समय में की जाती हैं, जैसे कि एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना, या खुद का कोई काम करना, और इन सब गतिविधियों से सेहत को फायदे होते हैं. पद्मश्री से सम्मानित डॉ. के. के. सेठी ने कहा कि पैदल चलना व्यायाम का सबसे अच्छा तरीका है, जिसमें किसी निवेश की आवश्यकता नहीं है, कोई विशेष प्रशिक्षण भी नहीं चाहिए होता है. प्राकृतिक वातावरण जैसे कि पार्क में घूमना मानसिक तनाव और थकान को कम करता है और फील गुड हार्मोन एंडोर्फिन के रिलीज होने से मूड में सुधार करता है. प्रकृति के साथ निकटता आध्यात्मिक यात्रा में भी मदद करती है और रक्तचाप एवं नाड़ी की दर को नियंत्रित करती है.

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चिकित्सकों ने शारीरिक सक्रियता के लिए कुछ सुझाव दिए :
-जितनी बार हो सके सीढ़ियों से आएं-जाएं.
-एक स्टॉप पहले उतरें और बाकी रास्ता पैदल चलकर जाएं.
-बैठकर मीटिंग करने की बजाय खड़े रहकर मीटिंग करें.

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-पास की दुकानों पर पैदल ही जाएं.
-फोन पर बात करते समय खड़े हों या चलें फिरें.
-इंटरकॉम या फोन का उपयोग करने के बजाय अपने सहयोगी से बात करने के लिए चलकर उसके पास जाएं.
-काम के दौरान या दोपहर के भोजन के दौरान अपनी इमारत के चारों ओर चलें-फिरें.
-प्रत्येक दिन 80 मिनट चलें. सप्ताह में 80 मिनट तक प्रति मिनट 80 कदम की गति से ब्रिस्क वॉक करें. (एजेंसी से इनपुट)

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