Alert: HIV के दुर्लभ प्रकार की पहचान, जानें इसके बारे में सब कुछ…


अमेरिका की स्वास्थ्य सेवा कंपनी ने ह्यमून इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) के एक नये उपप्रकार की पहचान करने का दावा किया है.

वैज्ञानिकों ने कहा है कि उनकी खोज दिखाती है जीनों के समूह के अनुक्रमण (जीनोम सीक्वेंसिंग) में अग्रणी रहने से जीन में बदलाव यानि म्यूटेशन को रोकने में मदद मिल रही है.

अबॉट प्रयोगशाला ने बताया है कि 1980 के दशक से लेकर 2001 के बीच लिए गए खून के नमूनों में से तीन व्यक्तियों में एचआईवी-1 समूह एम का उपप्रकार ‘एल’ मिला है.

वर्ष 2000 में जारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक किसी नये उपप्रकार की घोषणा के लिए तीन मामलों का अलग-अलग पता चलना चाहिए. समूह एम एचआईवी-1 विषाणु का सबसे आम रूप है. उपप्रकार एल इस समूह का 10वां और दिशा-निर्देश जारी होने के बाद से पहला उपप्रकार है जिसकी पहचान हुई है.

एचआईवी वैक्‍सीन 
कुछ माह पहले इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव (आईएवीआई) ने एचआईवी वैक्सीन विकसित करने की दिशा में एक अनोखी पहल शुरू की है. इस पहल के तहत एचआईवी की रोकथाम में कारगर एक विशेष प्रकार के ताकतवर प्रोटीन बनाने के लिए पहला कदम बढ़ाते हुए पहले चरण का परीक्षण शुरू करने की घोषणा की गई है. आईएवीआई के प्रेसिडेंट और सीईओ मार्क फीनबर्ग ने कहा, “दुनिया में एचआईवी के संक्रमण की रोकथाम करने के लिए एक नई विधि की जरूरत है.”

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एड्स पीड़ितों के लिए अच्छी खबर, स्टेम सेल transplantation के बाद व्यक्ति को HIV संक्रमण से मिली निजात



लंदन: लाइलाज एवं जानलेवा बीमारी एड्स से पीड़ित लोगों के लिये एक अच्छी खबर है कि लंदन में एक व्यक्ति के स्टेम सेल प्रतिरोपण के बाद उसके एचआईवी संक्रमण से मुक्त होने का मामला सामने आया है. स्टेम सेल प्रतिरोपण के बाद एड्स विषाणु से मुक्त होने का यह दूसरा मामला है. इस बारे में भारतीय मूल के शोधकर्ता के नेतृत्व वाली वैज्ञानिकों की टीम का अध्ययन नेचर जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

इससे पहले बर्लिन में भी एक मरीज इस विषाणु से छुटकारा पा चुका है. पत्रिका ‘नेचर’ के अनुसार अनुसंधानकर्ताओं ने बताया कि एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के इससे छुटकारा पाने का पहला पुष्ट मामला 10 साल पहले सामने आया था. इसके बाद अब लंदन में यह मामला सामने आया है जिसमें प्रतिरोपण के करीब 19 महीनों बाद भी व्यक्ति में विषाणु का कोई संकेत नहीं मिला. ‘लंदन रोगी’ का नाम नहीं लिया गया है. उसके 2003 में एचआईवी और 2012 में हॉजकिन्स लिंफोमा से पीड़ित होने पता चला था. एचआईवी संक्रमित रहे ये दोनों मरीज रक्त कैंसर से पीड़ित थे और उनका अस्थि मज्जा प्रतिरोपण किया गया था. उन्हें एक ऐसे दुर्लभ आनुवंशिक उत्परिवर्तन वाले लोगों के स्टेम सेल प्रतिरोपित किए गए जो एचआईवी के प्रतिरोध में सक्षम है.

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यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) में प्रोफेसर रवींद्र गुप्ता ने कहा कि नये अध्ययन का विषय मरीज का एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी (एआरवी) बंद किये जाने के बाद 18 महीने तक सुधार. गुप्ता ने कहा कि फिलहाल एचआईवी का उपचार करने का एकमात्र तरीका विषाणु को दबाने के लिये दवा है, जिसे लोगों को समूचे जीवन लेने की आवश्यकता होती है. यह खास तौर पर विकासशील देशों के लिये चुनौती पेश कर रहा है. उन्होंने एक बयान में कहा कि विषाणु का खात्मा करने का तरीका ढूंढना अत्यावश्यक वैश्विक प्राथमिकता है, लेकिन यह विशेष रूप से मुश्किल है क्योंकि विषाणु अपने होस्ट के सफेद रक्त कोशिकाओं में शामिल हो जाता है.

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टीम ने कहा कि ताजा मामला इस अवधारणा का प्रमाण है कि वैज्ञानिक एक दिन एचआईवी से होने वाले एड्स को समाप्त करने में सक्षम होंगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एचआईवी का इलाज ढूंढ लिया गया है. टीम में यूसीएल और इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं के साथ-साथ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी शामिल थे. गुप्ता ने कहा कि उसी नजरिये का इस्तेमाल करके दूसरे मरीज में भी छुटकारा पाकर, हमने दिखाया है कि बर्लिन के मरीज को इससे छुटकारा दिलाना असामान्य नहीं था और यह वास्तव में उपचार का तरीका था, जिसने इन दो लोगों में एचआईवी का खात्मा किया.

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उन्होंने कहा कि अपने शोध को जारी रखते हुए, हमें यह समझने की आवश्यकता है कि क्या हम एचआईवी वाले लोगों में इस रिसेप्टर को बाहर कर सकते हैं, जो जीन थेरेपी के साथ संभव हो सकता है. गुप्ता और उनकी टीम ने इस बात पर जोर दिया कि अस्थि मज्जा प्रतिरोपण एक खतरनाक एवं कष्टदायक प्रक्रिया है. यह एचआईवी उपचार का व्यावहारिक विकल्प नहीं है, लेकिन स्टेम सेल प्रतिरोपण से एड्स विषाणु से छुटकारा मिलने का दूसरा मामला सामने आने के बाद वैज्ञानिकों को इसका उपचार खोजने में काफी मदद मिल सकती है.

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पीटर डोर्थी इंस्टीट्यूट फॉर इन्फेक्शन एंड इम्युनिटी के निदेशक शैरोन आर लेविन ने कहा कि दूसरा मामला इस विचार को मजबूत करता है कि उपचार संभव है. उपचार के तौर पर अस्थि मज्जा प्रतिरोपण व्यावहारिक नहीं है, लेकिन इससे उपचार की अन्य पद्धति खोजने में मदद मिल सकती है. एचआईवी हर साल करीब 10 लाख लोगों की जान लेता है. (इनपुट एजेंसी)

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बच्चों में AIDS को रोकने संबंधी कार्यक्रम वहां नहीं हो रहे, जहां होने चाहिए, जानिए ये जरूरी बातें



नई दिल्ली: चिकित्सकों का कहना है कि एड्स से संबंधित मौतों व नये संक्रमणों में कमी जरूर आ रही है लेकिन इसे खत्म करने की प्रक्रिया तेज नहीं हो पा रही है. चिकित्सकों के मुताबिक, वायरस का इलाज करने और इसे बड़े बच्चों में फैलने से रोकने संबंधी कार्यक्रम वहां नहीं हैं, जहां उन्हें होना चाहिए.

हार्ट केयर फाउंडेशन (एचसीएफआई) के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा कि एचआईवी वायरस रिजर्वोयर सेल्स में छिपा रहता है. इस कारण से, एचआईवी संक्रमण, जो एंटीरेट्रोवाइरल दवाओं (एआरटी) के साथ में है, एआरटी बंद होते ही फिर से सक्रिय हो जाता है. इन छिपी हुई रिजर्वोयर सेल्स को खत्म करना इसलिए आवश्यक है ताकि उपचार हो सके. उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक आज बेहतर तरीके जानते हैं, उनके पास ज्ञान और तकनीक दोनों हैं, जिससे इस रोग के इलाज खोजने की उम्मीदें जागती हैं. एचआईवी या एड्स विभिन्न जन जागरूकता अभियानों, अत्याधुनिक चिकित्सा हस्तक्षेप और विकसित तकनीक की उपलब्धता के बावजूद भारतीय आबादी को प्रभावित कर रहा है.

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दुनिया में एचआईवी के 5 लाख मामले जानकारी में नहीं
डॉ. के.के. अग्रवाल ने कहा कि इसका एक बड़ा हिस्सा उस सामाजिक कलंक के कारण भी है जो हमारे समाज ने इस बीमारी से जोड़ रखा है. यह भी एक कारण है कि लोग नियमित जांच कराने से बचते हैं. इस तथ्य के साथ विभिन्न रोग निवारण उपायों के बारे में आम जनता को शिक्षित करने की तत्काल आवश्यकता है, ताकि एचआईवी से पीड़ित लोग सामान्य जीवन जी सकें. यूनिसेफ की रिपोर्ट में 2030 तक 14 लाख एचआईवी संक्रमित बच्चों की संख्या में कमी के वैश्विक लक्ष्य का हवाला दिया गया है. हालांकि, 19 लाख की अनुमानित संख्या से पता चलता है कि दुनिया में लगभग 5,00,000 मामलों की जानकारी नहीं है.

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गर्भवती महिलाएं जरूर कराएं एचआईवी परीक्षण
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि एचआईवी किसी संक्रमित महिला से उसके बच्चे तक गर्भावस्था और प्रसव के दौरान फैल सकता है. यह स्तनपान के माध्यम से एक मां से उसके बच्चे में भी जा सकता है. सभी गर्भवती माताओं को एचआईवी परीक्षण करवाना चाहिए. यौन पार्टनर या नशा करने वाले पार्टनर के मामले में, गर्भावस्था या स्तनपान के दौरान मां से शिशु तक इस रोग को फैलने से रोकने के लिए जल्द से जल्द एंटीरेटरोवाइरल थेरेपी शुरू की जानी चाहिए.

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एचआईवी को लेकर इन बातों पर करें अमल
डॉ. अग्रवाल ने कुछ अन्य तथ्यों पर प्रकाश डाला जो कि निम्नलिखित हैं.
* सुरक्षित सेक्स के लिए एबीसी : एब्सटेन यानी संयम, बी फेथफुल यानी अपने साथी के प्रति वफादार रहें और कंडोम का प्रयोग करें.
* शराब पीने या ड्रग्स लेने से जांच प्रभावित हो सकती है. यहां तक कि जो लोग एड्स के जोखिमों को समझते हैं और सुरक्षित सेक्स का महत्व भी जानते हैं, वे भी नशे की हालत में लापरवाह हो सकते हैं.
* एसटीआई वाले लोगों को शीघ्र उपचार की तलाश करनी चाहिए और संभोग से बचना चाहिए या सुरक्षित सेक्स का अभ्यास करना चाहिए.
* प्रयुक्त संक्रमित रेजर ब्लेड, चाकू या उपकरण जो त्वचा को काटते या छेदते हैं, उनमें एचआईवी फैलने का कुछ जोखिम भी होता है.
* एचआईवी पॉजिटिव लोगों को खुद चाहे पता न लगे, फिर भी वे अनजाने में वायरस को दूसरों तक पहुंचा सकते हैं.

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World AIDS Day 2018: असुरक्षित यौन संबंध है सबसे बड़ी वजह, HIV होने के बाद कितने समय में होता है एड्स?


HIV सबसे ज्यादा असुरक्षित यौन संबंध बनाने से फैलता है. ये खतरनाक इसलिए है क्योंकि इससे एड्स डेवलप होता है और फिर व्यक्ति को बचा पाना नामुमकिन होता है.

एड्स ऐसी खतरनाक बीमारी है जो एचआईवी वायरस की वजह से होती है. एचआईवी वायरस से इंफेक्टेड इंसान को कितने दिनों में एड्स की बीमारी हो सकती है?

World AIDS Day 2018: HIV और AIDS में ये है फर्क, जानें कैसे होती है ये जानलेवा बीमारी

एचआईवी वायरस को एड्स में बदलने में कितना समय लगेगा, यह कई कारकों पर निर्भर करता है.

समसे पहल तो ये समझना जरूरी है कि अगर किसी इंसान में HIV वायरस आ जाए तो वह धीरे-धीरे उसे एड्स की ओर ले जाता है. अक्सर एचआईवी पॉजटिव से एड्स का मरीज बनने में 8-10 वर्षों का समय लगता है. हालांकि ये सब इंसान की इम्युनिटी पॉवर और उसे होने वाले इंफेक्शंस पर निर्भर करता है. अगर किसी को HIV पॉजिटिव होने के बाद 3 से 4 तरह के इंफेक्शन हो तो वो एड्स की जद में जल्दी पहुंच जाता है.

कई मामले ऐसे भी देखे जाते हैं जब एचआईवी पॉजटिव होने का पता ही बहुत देर में चलता है, तब तक इंसान कई तरह के इंफेक्शन का शिकार हो जाता है.

World AIDS Day 2018: ये होते हैं HIV एड्स के शुरुआती लक्षण, कभी ना करें इग्नोर…

World AIDS Day
दुनिया भर में हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है. इस बार इसकी थीम है ‘Know your status’. यानी लोगों से अपील है कि वे अपने HIV स्टेटस के बारे में पता लगाएं.

जानें लक्षण
डॉक्टर्स कहते हैं कि इस बीमारी के आरंभिक लक्षणों को पहचानना मुश्किल होता है. पर अगर आप एलर्ट हों तो ये संभव है. ये संक्रमण होने पर आपको बुखार होता है. लगातार थकान की शिकायत रह सकती है. सिर में लगातार दर्द रहना, गला खराब रहना भी इस गंभीर बीमारी का एक लक्षण हो सकता है. तेजी से वजन घटने लगे तो सतर्क रहें.

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World AIDS Day 2018: HIV और AIDS में ये है फर्क, जानें कैसे होती है ये जानलेवा बीमारी


ज्यादातर लोग HIV और AIDS को एक ही बीमारी मानते हैं. पर ऐसा होता नहीं. ये दोनों बीमारियां अलग-अलग हैं. इनमें ताल्लुक है पर इसका ये मतलब नहीं कि HIV संक्रमित व्यक्ति को AIDS हो.

World AIDS Day 2018: ये होते हैं HIV एड्स के शुरुआती लक्षण, कभी ना करें इग्नोर…

क्या है HIV?
HIV का मतलब होता है Human immunodeficiency Virus. ये वायरस सेक्स के माध्यम से फैलता है. सेक्स के माध्यम से ये आपके शरीर में तब प्रवेश करता है जब आप संक्रमित पुरुष या महिला के साथ असुरक्षित यौन संबंध स्थापित करते हैं. यानी किसी को HIV है तो उसके साथ बिना प्रोटेक्शन के सेक्स से ये वायरस शरीर में प्रवेश कर जाता है. सेक्स के अलावा ये शरीर से निकलने वाले फ्लूइड जैसे की वैजाइना से निकलने वाला फ्लूइड या सिमेन, लार या ब्लड के संपर्क में आने से भी हो सकता है. HIV वायरस का टेस्ट करने पर जब रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो उसे HIV Positive कहा जाता है.

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Cells that hide AIDS viru

AIDS क्या है?
AIDS यानी Acquired Immune Deficiency Syndrome. किसी HIV पॉजिटिव व्यक्ति को एड्स होने में 10 साल तक का समय लग जाता है. इस स्टेज में व्यक्ति के शरीर की इम्युनिटी बेहद कम हो जाती है. उसे कई इन्फेक्शन एक साथ होने का खतरा रहता है.

HIV और AIDS में फर्क
एड्स को आप HIV इन्फेक्शन की अगली स्टेज की तरह समझ सकते हैं. HIV एक वायरस है, जो शरीर के इम्यून सिस्टम को बेहद कमजोर बना देता है. अगर सही समय पर HIV का इलाज शुरू ना किया जाए या HIV का पता ही ना चले तो शरीर में इंफेक्शन बढ़ने लगते हैं. फिर ये AIDS बन जाता है.

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World AIDS Day
दुनिया भर में हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है. इस बार इसकी थीम है ‘Know your status’. यानी लोगों से अपील है कि वे अपने HIV स्टेटस के बारे में पता लगाएं.

जानें लक्षण
डॉक्टर्स कहते हैं कि इस बीमारी के आरंभिक लक्षणों को पहचानना मुश्किल होता है. पर अगर आप एलर्ट हों तो ये संभव है. ये संक्रमण होने पर आपको बुखार होता है. लगातार थकान की शिकायत रह सकती है. सिर में लगातार दर्द रहना, गला खराब रहना भी इस गंभीर बीमारी का एक लक्षण हो सकता है. तेजी से वजन घटने लगे तो सतर्क रहें.

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World AIDS Day 2018: ये होते हैं HIV एड्स के शुरुआती लक्षण, कभी ना करें इग्नोर…


Human immunodeficiency virus यानी HIV दुनिया में अब भी प्रमुख हेल्थ इश्यूज में से एक है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में करीब 36.9 मिलियन लोग HIV से पीड़ित हैं.

Tips: कितनी देर में जाना चाहिए बाथरूम? यूरीन रोकने से खराब होता है पूरा शरीर…

World AIDS Day
दुनिया भर में हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है. इस बार इसकी थीम है ‘Know your status’. यानी लोगों से अपील है कि वे अपने HIV स्टेटस के बारे में पता लगाएं.

क्या है ये बीमारी
HIV एड्स एक ऐसी बिमारी है, जिसका कोई इलाज नहीं है. यह बिमारी का एक बड़ा कारण है असुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाना. यदि आप इस बीमारी से ग्रसित लोगों के संपर्क में आते हैं, तो भी ये बीमारी आपको जकड़ सकती है.

जानें लक्षण
डॉक्टर्स कहते हैं कि इस बीमारी के आरंभिक लक्षणों को पहचानना मुश्किल होता है. पर अगर आप एलर्ट हों तो ये संभव है. जानें क्या होते हैं इसके आरंभिक लक्षण.

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– ये संक्रमण होने पर आपको बुखार होता है. चूंकि इम्यून पावर कम होती जाती है, इससे शरीर बुखार से लड़ नहीं पाता.
– लगातार थकान की शिकायत रह सकती है. शरीर का इम्यून पावर कम होने के कारण उसे आराम की अधिक आवश्यकता होती है. और जब ऐसा नही हो पाता, तो लगातार थकान का बना रहना स्वभाविक बात है.
– सिर में लगातार दर्द रहना, गला खराब रहना भी इस गंभीर बीमारी का एक लक्षण हो सकता है. एड्स के शुरूआती दौर में रोगी को दिनभर और रात में भी लगातार सिर दर्द की शिकायत हो सकती है.
– एड्स की शुरुआत में ये आपके इम्यून सिस्टम पर बुरा असर डालता है. जिसकी वजह से त्वचा की बाहरी सतह पर इसका बुरा असर हो सकता है. इसकी वजह से त्वचा पर निशान और रैशेज की समस्या हो सकती है.
– तेजी से वजन घटने लगे तो सतर्क रहें.
– अगर सोते हुए भी पसीना आने लगे.
– अगर आपके नाखून पीलापन लिए, क्षतिग्रस्त या भुरभुरे हो चुके हैं तो आपको इसे गंभीरता से लेना चाहिए.

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New HIV Vaccine Comes Closer to Reality



HIV vaccine could soon be a reality. Researchers have found that Treg cells, a type of regulatory lymphocyte, might be protecting babies in the womb from getting infected with the HIV virus when the mother is infected.

“Finding out what protects the majority of babies is important, as it can lead to ways to boost natural immune responses and make individuals resistant to HIV infection,” said researcher Peter Kessler from the Emory University School of Medicine.

Scientists had been puzzled for years by the fact that only a minority of babies born to mothers with HIV infection get the infection from their mothers. Currently, HIV infection can be successfully managed with antiretroviral drugs, but these drugs have to be given for life. Preventing the infection is very important, but there is no vaccine available yet.

Researchers found that levels of Treg lymphocytes were higher in the blood of newborn babies born to mothers with HIV infection who had escaped the infection themselves, compared with babies who were born with HIV infection.

Lymphocytes are cells of the immune system that protect the body by fighting bacteria and viruses. Treg cells, or regulatory T cells, are an important “self-check” in the immune system to prevent excessive immune reactions that could lead to tissue damage.

The researchers examined the blood of 64 babies who were born HIV-uninfected and 28 babies born HIV-infected and found that Treg cell levels were higher in uninfected babies at the time of birth. In contrast, other lymphocyte types were activated and higher in HIV-infected infants. The HIV virus can only infect cells that are activated, so Treg may protect from HIV infection by suppressing activation of other lymphocytes.

They analyzed the stored blood by flow cytometry, a technique that can differentiate between the different types of cells based on what markers they express on their surface. Regulatory T cells come in many forms with the most well-understood being those that express the markers CD4, CD25, and FOXP3.

“Even though the number of babies studied is relatively small, these findings indicate that Treg, by controlling immune activation, may lower the vulnerability of the babies to HIV or other chronic infections even before they are born,” said Kessler.

These results could pave the way for the development of vaccines or other immune-based therapies that could be used together with medications to prevent the spread of HIV or other infections from mothers to their babies.

The research was presented at ASM Microbe, the American Society for Microbiology’s annual meeting.



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