World Kidney Day 2019: पहले बहनों ने दी, तीसरी बार पति ने किडनी दे कराया ट्रांसप्‍लांट, पढ़ें दिल को छू लेने वाली कहानी…


राष्ट्रीय राजधानी के एक अस्पताल में 45 वर्षीय महिला एतिका कालरा का तीसरी बार सफल गुर्दा प्रत्यारोपण (किडनी ट्रांसप्लान्ट) हुआ. महिला के पति ने अपनी किडनी देकर उसकी जान बचाई. चिकित्सकों ने इस बात की जानकारी दी.

इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के जनरल सर्जरी, जीआई सर्जरी एवं ट्रांसप्लान्टेशन के सीनियर कन्सलटेन्ट डॉ. (प्रोफेसर) संदीप गुलेरिया (पद्मश्री विजेता) और उनकी टीम ने इस मुश्किल ट्रंसप्लान्ट को सफलतापूर्वक किया.

सर्जरी के बारे में बताते हुए डॉ. संदीप गुलेरिया ने कहा, ‘1996 में जब महिला 23 साल की थी और हाल ही में उनकी शादी हुई थी, तभी एक नियमित जांच में पता चला कि उनके गुर्दे सिकुड़ रहे हैं. जांच करने पर पता चला कि वे ग्लोमेरूलोनेफ्राइटिस से पीड़ित हैं, इसमें किडनी का खून छानने वाले अंग खराब हो जाते है. तभी से महिला इस बीमारी से लड़ रही हैं’.

उन्होंने कहा, ‘पहले तो उन्होंने आयुर्वेदिक तरीकों से इलाज करवाया, लेकिन उन्हें बिल्कुल आराम नहीं मिला. उनके खून में क्रिएटिनाईन का स्तर लगातार बढ़ रहा था. दिसम्बर 2000 में उनके गुर्दों ने काम करना बिल्कुल बंद कर दिया और उन्हें नियमित डायलिसिस शुरू करना पड़ा. 2001 में उन्होंने पहली बार किडनी ट्रांसप्लान्ट करवाया. उस समय उनकी बड़ी बहन अंशु वालिया ने उन्हें अपनी किडनी दान में दी थी. एक दशक तक यह किडनी ठीक से काम करती रही, लेकिन डोनेट किए गए अंग की लाइफ सीमित होती है, 2014 में उन्हें फिर से समस्या होने लगी’.

डॉ. संदीप गुलेरिया ने कहा कि जांच करने पर पता चला कि उनकी पहली किडनी ने काम करना बंद कर दिया था और अब हम उन्हें डायलिसिस पर भी नहीं रख सकते थे. उनकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी. हमने फिर से ट्रांसप्लान्ट करने का फैसला लिया. अब उनकी दूसरी बहन रितु पाहवा ने उन्हें किडनी डोनेट की.

डॉ. गुलेरिया ने ऑपरेशन में आई अप्रत्याशित जटिलताओं पर बात करते हुए कहा, ‘दूसरे ट्रांसप्लांट के कुछ ही दिनों बाद, जब महिला आईसीयू में थीं तब उन्हें तेज पेट दर्द की शिकायत हुई. जांच करने पर पता चला कि उनकी आंत (इंटेस्टाईन) में गैंग्रीन हो गया था. हमें तुरंत उनकी जान बचाने के लिए मेजर सर्जरी करनी पड़ी और यह सब तब हुआ जब वह दूसरे किडनी ट्रांसप्लांट के बाद धीरे-धीरे ठीक हो रही थीं’.

दुर्भाग्य से दूसरी किडनी भी सिर्फ चार साल तक चली, जिसके बाद इसने भी काम करना बंद कर दिया.

उन्होंने बताया, ‘यह ट्रांसप्लान्ट किए गए अंग के लिए एक्यूट एंटीबॉडी रिजेक्शन का मामला था, जिसमें महिला के खुद के इम्यून सिस्टम ने किडनी को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया. इस समय हमारे पास दो ही विकल्प थे, या तो फिर से किडनी ट्रांसप्लान्ट किया जाए या उन्हें शेष जीवन के लिए डायलिसिस पर रखा जाए. इस बार उनके पति, तरुण ने उन्हें अपनी किडनी देने का फैसला लिया’.

डॉ. गुलेरिया ने बताया, ‘हमने परिवार को सर्जरी के संभावी जोखिमों के बारे में जानकारी दी, जिसके बाद परिजनों ने किडनी ट्रांसप्लान्ट के लिए सहमति दे दी. लेकिन दोनों का ब्लड ग्रुप मैच नहीं हुआ, एबीओ इन्कम्पेटिबिलिटी के लिए हमें कई बार प्लाज्मा एक्सचेंज करना पड़ा. पहले दो ट्रांसप्लान्ट्स में लगभग तीन घंटे लगे थे, लेकिन तीसरे ट्रांस्प्लान्ट में साढ़े पांच घंटे लगे, क्योंकि यह ऑपरेशन काफी मुश्किल था. हालांकि सभी मुश्किलों के बावजूद हमने तीसरी बार उनका सफल किडनी ट्रांसप्लान्ट किया.
मरीज अब ठीक हैं और दूसरे लोगों को भी मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रेरित करना चाहती हैं’.

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World Kidney Day 2019: क्रोनिक किडनी डिसीज की जद में आ रहे भारतीय, जानें इसके बारे में सब कुछ…


जीवनशैली की बीमारियों के प्रसार के साथ भारत में Chronic kidney disease (CKD) में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है. चिकित्सकों का कहना है कि बढ़ता वायु प्रदूषण भी क्रोनिक किडनी रोगों के बढ़ते जोखिम का एक कारक है. विशेषज्ञों के मुताबिक, सीकेडी की बढ़ती घटनाओं के साथ भारत में डायलिसिस से गुजरने वाले रोगियों की संख्या में भी हर साल 10 से 15 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है. इस प्रतिशत में कई बच्चे भी शामिल हैं.

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दुर्भाग्य से, लगातार बढ़ती घटनाओं के बावजूद, गुर्दे की बीमारी को अभी भी भारत में उच्च प्राथमिकता नहीं दी जाती है. सीकेडी के उपचार और प्रबंधन का आर्थिक कारक भी रोगियों और उनके परिवारों के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय है.

आकाश हेल्थकेयर में नेफ्रोलॉजी और रीनल प्रत्यारोपण के वरिष्ठ सलाहकार और निदेशक डॉ उमेश गुप्ता ने कहा, ‘सीकेडी लाइलाज और बढ़ने वाली बीमारी है, जो समय के साथ गुर्दे के कार्य को कम करता है और रोगी को आजीवन देखभाल और चिकित्सा उपचार की आवश्यकता होती है. गुर्दे लाखों छोटी संरचनाओं से बने होते हैं जिन्हें नेफ्रॉन कहा जाता है जो रक्त को फिल्टर करते हैं. अगर ये नेफ्रॉन क्षतिग्रस्त हो गए, तो यह गुर्दे के कामकाज को प्रभावित कर सकता है, जिससे गुर्दे की बीमारी भी हो सकती है’.

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उन्होंने कहा, ‘किडनी की बीमारी का कोई लक्षण नहीं है, यह मुख्य रूप से उच्च रक्तचाप और मधुमेह वाले लोगों को प्रभावित करता है जो बहुत आम है. कुछ असामान्य लक्षण सूजन, संक्रमण (पायलोनेफ्राइटिस), मूत्र प्रणाली में रुकावट, और दर्द निवारक दवाओं (एनएसएआईडी) का अधिकतम सेवन है. जो लोग व्यस्त कार्यक्रम रखते हैं और उचित संतुलित आहार नहीं लेते हैं, उनमें गुर्दे की बीमारी होने का खतरा अधिक होता है’.

डॉ. गुप्ता ने कहा, ‘जो लोग अपनी फिटनेस के बारे में अधिक जागरूक हैं और एक आकर्षक और मांसपेशियों वाले शरीर को पाने के लिए फिटनेस की खुराक लेते हैं, उन्हें भी जोखिम होता है और ये समय के साथ क्रोनिक किडनी रोग की ओर ले जा सकते हैं’.

क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ और हेल्थकेयर एटहोम (एचसीएएच) के मुख्य परिचालन अधिकारी डॉ. गौरव ठुकराल कहते हैं, ‘अध्ययनों ने भारत में सीकेडी के बोझ को हर दस लाख लोगों के लिए 800 से अधिक आंका है जो कि हमारी आबादी को देखते हुए एक महत्वपूर्ण संख्या है. सीकेडी का उपचार और प्रबंधन एक लंबी प्रक्रिया है जिससे रोगियों और उनके परिवारों को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानी होती है’.

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डॉ. गौरव ठुकराल ने कहा, ‘इस असुविधा को कम करने के लिए क्वालिटी होम हेल्थकेयर समाधान प्रयासरत हैं. वे एक व्यापक स्वास्थ्य शिक्षा योजना प्रदान करते हैं. वे सीकेडी रोगियों के लिए एक विशेष देखभाल योजना विकसित करते हैं. वे सुनिश्चित करते हैं कि रोगी एक स्वस्थ जीवनशैली का पालन करें. यह सब रोगी के घर पर उपलब्ध कराया जाता है’.

उन्होंने कहा, ‘होम हेल्थकेयर समाधान मरीजों और उनके परिवारों के लिए एक अधिक सुविधाजनक और लागत प्रभावी विकल्प है. उदाहरण के लिए, एचसीएएच 30 फीसदी कम लागत पर उन्हीं के घर में रोगियों को अस्पताल जैसी पेरिटोनियल डायलिसिस प्रदान करता है और डायलिसिस के लिए अस्पताल में रोगियों के लिए द्वि-साप्ताहिक यात्राओं को समाप्त करके देखभाल करने वालों के तनाव को कम करता है’.

डॉ. गौरव ने कहा कि होम हेल्थकेयर वास्तव में भारत के सीकेडी बोझ के प्रबंधन के लिए एक तत्काल, लागत प्रभावी, आरामदायक और उच्च-गुणवत्ता वाला समाधान है.

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World Kidney Day 2019: हर साल किडनी के लाखों नए मरीज रजिस्‍टर्ड, जानें कारण, लक्षण और बचाव…


देश में औसतन 14 प्रतिशत महिलाएं एवं 12 प्रतिशत पुरुष किडनी की समस्या से पीड़ित हैं. भारत में हर साल दो लाख लोगों को किडनी रोग हो जाता है. शुरुआती स्टेज में इस बीमारी को पकड़ पाना मुश्किल है, क्योंकि दोनों किडनी 60 प्रतिशत खराब होने के बाद ही मरीज को इसका पता चल पाता है. यही वजह है कि हर साल विश्‍व किडनी दिवस मनाया जाता है. साल 2019 की थीम ‘किडनी हेल्थ फॉर एवरीवन एवरीवेयर’ रखी गई है.

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बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के सीनियर कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. राजेश अग्रवाल ने बताया, ‘देश में औसतन 14 प्रतिशत महिलाएं एवं 12 प्रतिशत पुरुष किडनी की समस्या से पीड़ित हैं. विश्व में 19.5 करोड़ महिलाएं किडनी की समस्या से पीड़ित है. भारत में भी यह संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, यहां हर साल दो लाख लोगों को किडनी रोग हो जाता है. किडनी के खराब होने के कारण ही शरीर में खून का क्रिएटनिन बढ़ना शुरू होता है, खून में पाए जाने वाले खराब तत्व कोक्रिएटनिन कहते है’.

कारण
किडनी के खराब होने के कारणों के बारे में बताते हुए डॉ. राजेश ने कहा कि आमतौर पर मूत्र मार्ग में संक्रमण और प्रतिकूल गर्भावस्था परिणाम के कारण महिलाओं को गंभीर किडनी रोग हो जाता है. किडनी के खराब होने के निम्न कारण हैं, जैसे कम मात्रा में पानी पीना, अधिक मात्रा में नमक खाना, दर्दनाशक दवाओं का अधिक सेवन करना, अधिक शराब पीना, मांस का अधिक सेवन करना, धूम्रपान करना और अधिक सॉफ्ट-ड्रिक्स पीना.

लक्षण
वहीं किडनी खराब होने के लक्षणों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, ‘लगातार उल्टी आना, भूख ना लगना, थकान और कमजोरी महसूस होना, पेशाब की मात्रा कम होना, खुजली की समस्या होना, नींद ना आना और मांसपेशियों में खिंचाव होना किडनी खराब होने का कारण है’.

उपचार
उपचार के बारे में बताते हुए डॉ. राजेश अग्रवाल ने कहा कि जब किडनी ज्यादा खराब ना हुई हो, उस स्थिति में प्राथमिक उपचार के बाद दवा और भोजन में परहेज द्वारा इलाज किया जाता है. यह उपचार किडनी को ठीक करने में काफी मददगार होता है, इसमें ज्यादा खर्च की जरूरत नहीं पड़ती है. दोनों किडनी के खराब होने की वजह से जब किडनी के कार्य करने की क्षमता में कमी आ जाती है, तब डायालिसिस द्वारा इलाज की जरूरत होती है. इसके अलावा कई मरीज किडनी ट्रांसप्लांट कराकर भी अपना उपचार करा सकते हैं.

डॉक्‍टर्स की राय
गुरुग्राम स्थित नारायणा सुपर स्पेशेलिटी हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी एंड रीनल ट्रांसप्लांट के कंसल्टेंट डॉ. सुदीप सिंह सचदेव ने किडनी खराब होने से बचाव के उपायों के बारे में बताते हुए कहा, ‘किडनी हमारे शरीर में खून को साफ कर ब्लड सर्कुलेशन को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है. किडनी रोग से पीड़ित व्यक्ति को परेशानी महसूस होने पर तुरन्त उपचार कराना चाहिए, इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं करनी चाहिए. समय-समय पर ब्लड प्रेशर और शुगर की जांच करानी चाहिए. ब्लड प्रेशर या डायबीटीज के लक्षण मिलने पर हर छह महीने में पेशाब और खून की जांच कराना चाहिए’.

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उन्होंने कहा, ‘न्यूट्रिशन से भरपूर भोजन, नियमित एक्सरसाइज और वजन पर कंट्रोल रखने से भी किडनी को खराब होने से बचाया जा सकता है. पेनकिलर दवाओं का कम मात्रा में इस्तेमाल, अधिक मात्रा में तरल पदार्थो का सेवन करना, नमक का इस्तेमाल कम करना और धूम्रपान न करना से किडनी को खराब होने से बचाया जा सकता है. इसके साथ ही हाई रिस्क वाले लोगों को किडनी फंक्शन की जांच नियमित रूप से कराते रहना चाहिए’.

धर्मशिला नारायाणा सुपर स्पेशेलिटी हॉस्पिटल की डारेक्टर एंड सिनियर कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजी डॉक्टर सुमन लता ने कहा, ‘यह समय हमें अपने स्वास्थ पर कंट्रोल करने का है. हमें अपनी बुरी आदतों को छोड़कर हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना चाहिए. अधिक मात्रा में दर्द निवारक और काउंटर दवाओं के सेवन से बचना चाहिए. हम इस बात में विश्वास करते हैं कि निवारण, इलाज से बेहतर है’.

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